Wednesday, February 9, 2022

Mirage

 बहुत गर्म रेत थी, और भीतर थूक भी सूख चुका था 

मैं शायद वहीँ पे दम तोड़ देता 

पर वहीँ पास ही वो मुस्कुराता हुआ नीला उम्मीद का दरिया दिखा 

दूर से चिल्लाते हुए वोला "सुनो थोड़ा सा और चलो"

"देखो कितना ठंडा और मीठा पानी है मेरा "

"थक गए होगे, घर आओ ना , तुम भी तो पानी के ही बने हो "


मैंने हिम्मत बाँधी और थोड़ा चला, फिर कुछ और चला, फिर कुछ और

बहुत देर तक चला और बहुत दूर तक चला 

पर जितना भी चला वो दरिया हर बार उतनी ही दूर दिखा 

रस्ते में लगभग सूखे हुए कुवें मिले 

हर बार उतना ही पानी मिला जो मुझे ज़िंदा रख सके 

रस्ते में कई मुसाफिर भी मिले, सबने कहा की वो दरिया झूठा है 

नाम भी रखा था उन्होंने उस दरिया का, कुछ ने मृगतृष्णा बोला, कुछ ने सराब और कुछ ने Mirage 


दिन फिर चढ़ गया है, रेत फिर बहुत गर्म हो गयी है और भीतर थूकः फिर सूख चुका है 

एक सच यह है  की अगर में रुक जाऊ तो यह प्यास का सिलसिला खतम हो जायेगा, मेरे साथ ही 

एक झूठ भी है, यह दरिया, जो फिर बुला रहा है मुस्कुराते हुए

कह रहा है , घर आओ जल्दी।। 

Wednesday, May 6, 2020

आम का आचार

वहां सब  मिलता है माँ
मैंने झुंझलाते हुए कहा ,
और ऊपर से मेरे कपड़ो से भी अचार की बदबू आने लगेगी |

बदबू !!!! ?!!  मैंने देख  तेरे लिए कितने प्यार से बनाया है,
लेजा न प्लीज , माँ ऐसे गिडगिडाके बोली जैसे मैं एहसान करूँगा आम का अचार साथ ले जा के |

हमेशा ऐसा ही करती थी वो
कभी नहीं सुनती थी मेरी
यह ले जाओ, वो ले जाओ
चुपके से बिना पूछे कभी कभी बैग में कभी कंगी , कभी बोरोप्लस रख देती थी
कुछ बात नहीं मानती थी मेरी
जबकि हमेशा समझाता था मैं उसे की वहां सब मिलता है।


आज रेल गाडी का वक़्त हो रहा है मेरी
आज लग रहा था की कोई जबरजस्ती बैग में कुछ रख दे तो अपनापन सा लगे
कोई तो कंघी, रुमाल , झंडू बाम रख दे , या वही आम का आचार ,
हाँ तो आने दो न कपड़ो से आचार की खुशबू |
पर आज नहीं था आम का आचार
मैंने आखिरी बार खाली किचन को देखा और स्टेशन की तरफ चल दिया
सच तो है वहां सब मिलता है, पर अब तुम कहीं नहीं मिलोगी माँ ||



Saturday, January 3, 2015

म्यूजियम

बड़ी सी एक ईमारत
कुछ नाराज़ सी
कुछ उदास सी
कुछ खुश सी
कुछ उदास सी
दूसरी इमारतों की तरह उसमे लोग नहीं रहते थे
बस कुछ चीज़ें थी, पुरानी सी।

जैसे एक टुटा हुआ मोतियों वाला गुलाबी कंगन
जिसके पीछे पता नहीं कितनी कसमों ने दम तोडा
पता नहीं कितने दिल टूटे
और पता नहीं कितने लोग फिर मिटटी में मिल गए
आज पांच सौ साल बाद यहाँ एक चबूतरे के ऊपर पड़ा है
अजीब सी कहानी है उस हाँथ के कंगन की
चबूतरे के ऊपर लिखा है की कंगन को हाँथ लगाना मना है।

एक हिरन के चमड़े से बना एक बस्ता
जिसे किसी ने महीने भर की मजदूरी से ख़रीदा था
अपनी छोटी सी उम्र में बड़े प्यार से रखा था वो बस्ता
फिर एक रात एक सराय में किसी ने उसका गला दबा के वो बस्ता चुरा लिया
वहां से एक हाँथ से दूसरे उस बस्ते का सफ़र शुरू हुआ
अब छ सौ साल की उम्र में यहाँ आराम कर रहा है
बस्ता खोलोगे तो ठूंस ठूंस के भरी हुई ढेर सारी कहानियां बाहर निकल पड़ेंगी
अगर खोल पाये तो क्योंकि बस्ते को भी हाँथ लगाना मना है।

एक छोटी सी पथ्थर की स्लेट है
उसके बाबा ने मेले से खरीदी थी उसके लिए 700 साल पहले
उसकी नन्ही नन्ही उँगलियों ने बहुत कुछ लिखा था उस पे
अपना नाम, बाबा का नाम, अम्मा का नाम, गांव का नाम
वो नन्ही उँगलियाँ धीरे धीरे बड़ी हुई, फिर बूढी और फिर एक दिन गायब हो गयी
उस स्लेट पे अब कोई नहीं लिखता
ना उसके गांव का नाम, ना अम्मा का नाम, ना बाबा का नाम और ना ही उसका नाम
उस स्लेट को सुघोंगे तो आज भी उसके गिरे हुए कैरी के आचार की खुश्बू आएगी
उसे हाँथ लगाओगे तो शायद सदियों पहले जिए उस मासूम की छुवन महसूस होगी
अगर छु सके तो क्योंकि उस स्लेट को छूना मना है

और भी है कई सारी छोटी बड़ी सायानी चीजें
सब एक से एक कहानियां लिए हुए
एक किताब सी है वो,सबकी कहानियां समेटे हुए
भले ही लोग उसे ईमारत कहे भले ही लोग उसे Museum कहे।।

Tuesday, June 17, 2014

छम छम वाली बारिश

काम करते-करते अचानक नज़र खिड़की पे गयी
काले बादल, बिजलियों की रोशनी और बारिश हो रही थी
छम छम वाली बारिश

हलाकि AC के कारण खिडकियों पे पुख्ता कांच थे, पर बिना आवाज़ सुने ही पहचान जाता हूँ इसे
छम छम वाली बारिश

साठ के दशक के सिनेमा में कभी जब हीरो पार्टी में गाना गाता था, तो एक एक्स्ट्रा हुआ करती थी उस गाने में,
जो बिना सुर ताल अपनी ही धुन में नाचती थी।
जैसे उसे अपना सारा हुनर एक ही गाने में दिखा के लोगों से लोहा मनवाना है।
कुछ वैसी ही होती है छम छम वाली बारिश,
बिलकुल Show Off
पर जैसी भी हो, होती बड़ी मजेदार है
एक ही झटके में सब हरा सा हो जाता है,
सड़कें तालाब हो जाती है
और जब बारिश खत्म होती है
तो सारे पक्षी बहार गाना गाके जशन सा मनाते है।

थोडा सा मन किया मेरा
टाई को थोडा ढीला कर, चमड़े के जूते में बाहर निकलू और सारे कपडे गीले कर लूँ।
पर सब पागल समझेंगे मुझे।
ऐसा तो बस फिल्मों में ही अच्छा लगता है।
फिर मेरी उम्र भी हो गयी है
यह सोच खुद को रोक लिया।

शाम को घर निकलते वक़्त खिड़की से झाँक के देखा
लगता है फिर होगी छम छम वाली बारिश।
जल्दी से फाइल्स बंद की और तेज़ कदमों से में बाहर चल पड़ा
पीछे से आवाज़ आयी
"सर, छाता भूल के जा रहे हैं आप"
मुस्कुराके, सुना अनसुना करते हुए बाहर आया।
छम छम वाली बारिश बस शुरू होने को ही है।

Thursday, February 20, 2014

लहरें

किनारे पे खड़े तुम्हे देखते ही,
खुशी से मेरी श़क्ल बनने लगी ।
तेज़ी से दौड़ता हुआ
तुम्हारी तरफ चल पड़ा ।
और जब तुमसे टकराया
तो सब टूट गया
मेरे दुःख,
मेरे दर्द,
मेरी परेशानी,
मेरा बीता हुआ कल,
मेरा आने वाला कल ।
बचा केवल पानी, खामोश पानी ।
जाते जाते धीरे से तुम्हे गले लगाया,
फिर हलके से तुम्हारा माथा चूमा,
और अलविदा कह के गुम हो गया समंदर में ।
बस इतनी सी थी मेरी ज़िन्दगी ।

कई बार सोचा
अगर में वहीँ रुक जाता तो ??
कुछ और जी जाता तो ??
फिर सोचा
ऐसा होता तो वहां मैं, मैं नहीं होता
जो होता सच नहीं होता
और देखो, मेरा सच तो वोही है
मेरी हद
मेरी सीमा
मेरा किनारा।

किस्से कहानियों में नहीं मिलेगी,
कभी खोजनी हो मेरी ज़िन्दगी
तो उन्ही किनारों में ढूँढना ।
उन किनारों के पथ्थरों पे पड़े आड़े तिरछे निशानों पे
जिन्हें मैंने छुआ था कभी
जब मैं जिया था
जब मैं लहर था ।।

Friday, June 14, 2013

वो मकान



हरे भरे पहाड़ों के बीच एक नीली झील थी
झील के एक तरफ हरा भरा मैदान था, जिसके परे घना जंगल था
गर्मी में उस जंगल के सभी पेड़ों के पत्ते पीले  हो जाया  करते थे
और सर्दियों में उस मैदान की घास, लाल रंग के  छोटे छोटे फूलों से भर जाया करती थी ॥
झील के दूसरे तरफ लकड़ी  का एक घर था
बड़ा अजीब सा घर था
उस घर में न कोई खिड़की थी
न कोई दरवाज़ा
घर के एक तरफ एक दरार थी,
जहाँ से शायद झील और पहाड़ी दिखते हो ॥
उस दरार में से कभी कभी एक जोड़ी आँखे झाँका करती थी
और कभी कभी दो तीन नन्ही गोरी उँगलियाँ निकला करती थी
कटे हुए नाखू और एकदम साफ़ सुथरी धूली हुई उँगलियाँ
जिसकी सबसे छोटी ऊँगली में हरे रंग की रूबी की अंगूठी  थी ॥

फिर वो उँगलियाँ निकलना बंद  हो गयी
और मैं भी अपने काम में मसरूफ हो गया
वोही रोज़ का काम
सुबह सूरज जलाना
शाम को बुझाना
बादल लाना
बारिश लाना
चाँद के लालटेन में तेल भरना
और भी एक हज़ार छोटे बड़े काम ॥

फिर बरसो बाद एक दिन अचानक पता नहीं क्या सूझी
मैं उस घर की तरफ चल पड़ा
घर के आसपास कोई नहीं था
हलके पैरों से जाके मैंने उस दरार से झाँका
सामने की तरफ मुझे एक तिजोरी दिखी
आधी खुली हुई
कुछ चमक रहा था उसमे
कुछ हीरे मोती जैसा
पास  ही दीवार पे एक आला था
जिसमे कुछ खिलोने पड़े धुल खा रहे थे
वो  खिलोने जो कभी ज़मीन पे बिखरे रहते होंगे 
बचपन गुज़र गया, मैंने सोचा ॥
पास में बिस्तर लगा था
कोई लेटा था सतरंगी लोई पहन के
फिर मेरी नज़र लोई से झांकते हुए हाँथ पे पड़ी
हाँथ कभी रहा होगा
अब सिर्फ हड्डियाँ बची थी
जिसकी सबसे छोटी ऊँगली में हरे रंग की रूबी की अंगूठी  थी ॥



Thursday, June 13, 2013

रैनी डे

सारी रात हलचल रही
जैसे बादलों की बैठक में
     गरमा गरम बहस चल रही हो
रात भर वो एक दुसरे पे गरजते  रहे
    और एक दुसरे पे ज़ोरदार छींटअ कशी करते रहे

उस शोर शराबे के बीच
     पता ही नहीं चला, नींद न जाने कब लग गयी
जब आँख खुली तो बड़े आहिस्ता से बारिश हो रही हो
     जैसे रात के शोर के लिए शर्मिंदा रही हो

हाँ तो?!!, शर्मिंदा तो  हो होना ही चाहिए
सब की नींद ख़राब कर दी
सूरज अभी भी बादल ताने सो रहा है
पंछियों ने भी घोसला नहीं छोड़ा है
आज लोग नहीं पानी सड़क पे चल रहा है
सुबह का अखवार भी देखो गीला कर दिया
हाँ तो?!!, शर्मिंदा तो  हो होना ही चाहिए

फिर मेरी नज़र कांच की खिड़की पे गयी जिसपे हलकी सी धुंद है
उस पे छोटी छोटी उँगलियों से एक मुस्कुराता हुआ चेहरा बना है
रैनी डे है आज

Wednesday, June 5, 2013

बारिशें

पानी में गुम  रास्ते
और साथ बहती कागज़ की नाव
घुटनों तक मुड़ी हुई पोशाकें
और चप्पल पहने छप छप करते पावं

वक़्त पर यूनिफार्म का न सूखना
या तेज़ बारिश में स्कूल बस चूकना
या ज्यादा बारिश हो तो स्कूल का बंद हो जाना

बरसाती पहन घर से निकलना
पर मोड़ आते ही टोप जेब में ठूंस के बाल बनाना
फिर पानी को चीरते हुए तेज़ी से साइकिल चलाना

छाता भी बड़ा रंगीनमिजाज़  था हमारा
थोड़ी सी हवा से पलट जाया करता था
खुलता कम था फिर से साथ जरूर जाया करता था

दीवारों पे ठंडी सीलने
और उन से चूता पानी
हर दीवार के दाग की बड़ी अलग थी  कहानी

बड़ी मजेदार हुआ करती हैं बारिशें
पहले पानी बरसाती थी, अब यादें



Tuesday, June 4, 2013

वक़्त चोर

एक सुबह जब मैं आईने के सामने बाल बना रहा था
तो मुझे लगा आईने के अंदर कुछ हिला

 गौर से देखने जब करीब जाके आईने को हाँथ लगाया
तो लगा जैसे आइना ठोस  नहीं बल्कि दलदली है

फिर अचानक आईने में से दो हाँथ बाहर  निकले और मुझे अंदर खींचने लगे
बड़े मजबूत हाथ थे वो
बड़ी जद्दोजहत करनी पड़ी खुद को छुडाने में

कितना वक़्त लगा, बताना मुश्किल  है
पर जब मैंने फिर आइना देखा,
तो मेरे बाल सफ़ेद हो गए थे और चेहरे पे एक हज़ार झुर्रियां पड़ी थी

मैंने घबरा के आईने से चीख के पूछा
"यह क्या कर दिया तुमने"

आइना बोला  "मैंने क्या किया?!!,
वक़्त का हिसाब तो तुमने नहीं रखा,
आईने में  वो शख्स  तुम ही तो  थे
खुद से ही तो उलझे रहे इतने सालों "॥

Wednesday, April 17, 2013

खालीपन










इस्त्री की हुए तुम्हारी पोशाकें ,
ज्यों का त्यों अलमारी में रखी हुई हैं ।
हाँथ लगाने से डर  लगता है,
कहीं तह के  साथ तुम्हारी याद भी न टूट जाये ।

वो तुम्हारे महंगे जूते, जो हमें बहुत पसंद थे
एक दो बार पोशीदा भी रखे
पर तुमने उसे ढूँढ निकाला
आज भी कीचड़ से सने उस कोने में रखे हैं
जैसा की तुमने पहन के रख छोड़े थे आखिरी दिन ।

वो कहते हैं अब तुम रिहा हो  सबसे
मुझे भी रिहा कर दो मेरे भाई
तुम्हारे रूमाल से, तुम्हारे मोबाइल से
तुमसे जुडी तुम्हारी सारी  चीज़ों से
उन  गानों से जो हमने साथ में  सुने  थे
उन फिल्मों से जो हमने साथ में देखी थी
वो सारी  जगहों से जहाँ हम साथ जीये थे

घर बदल दूं , तुम्हारी चीजें दरिया में बहा दूँ
पर तुम्हारा हिस्सा  जो मुझसे जुदा है, उसका क्या
या चलो एक खेल खेलते हैं
मैं गिनती गिनता हूँ, सोचूंगा तुम छुपे हो
और कभी गिनती गिनना  कभी बंद नहीं करूँगा ॥

Monday, January 7, 2013

आँख

एक बार बड़ी जोर से वक़्त की आंधी चली
और घबरा के मैंने आँखें बंद कर ली 

आँखें खोली तो सब बदल गया था 
आंधी नहीं थी 
तुम नहीं थे 
मैं नहीं था 
और वक़्त भी नहीं था 
मेरी अनाथ आँख उस तरफ एक कोने में पड़ी थी
धूल  से सनी हुई, कांच के एक टुकड़े के पास 

फिर फीकी धुप में हलकी सी बारिश शुरू हो गयी 
और एक छोटा सा इन्द्रधनुष निकल आया ऊँचे आसमान में 
सब कुछ बड़ा सुन्दर सा था 
मैंने कांच से पूछा, "कैसा जीया मैं ?"
कांच का टुकड़ा बोला, "मैं कैसा जीया  ?"
मैंने कहा "पता नहीं पर तस्वीर तो तुम अभी थी दिखाते हो "
कांच मुस्कुरा  के बोला, 
"वो देखो शाम हो चली है 
अनाथ आँखों को बटोरने, वो लोग आते ही होंगे 
कोई पूछे क्या देखा अंतिम बार 
तो कहना सारे रंग  थे इन्द्रधनुष में "










Tuesday, October 30, 2012

औकात


कितना भी भर लूं ऊँची उड़ानें  आसमानों में
थक जाता हूँ तो ज़मीन पर ही मिलते हैं दो पल सुकून वाले
बड़े गहरे जवाब देता हूँ कोई जब पूछे की बात क्या है
खुद से पर कैसे छुपाऊ, मेरी औकात क्या है

लाख पाली दौलत हीरे जवाहरात वाली
पेट भरता है आज भी बस दाल चावल से
खाक पर  बैठा हूँ,कोई न पूछे जस्बात क्या है
खुद से पर कैसे छुपाऊ, मेरी औकात क्या है

जिस्म नाचते है शहर के सारे इशारों  पे मेरे
सुकून मिलता मगर थामता हाँथ मेरा प्यार से दो पल के लिए
जस्न छलावा  है , हर रात बारात क्या है
खुद से पर कैसे छुपाऊ, मेरी औकात क्या है



Monday, March 5, 2012

टूटा तारा

वो  तारा दोस्त था मेरा बचपन में
रोज़ सोने से पहले एक बार ज़रूर दिख जाया करता था
सर्दी में खिड़की के टूटे हुए कांच से झाँका करता था
और गर्मी में रोशनदान से 

फिर बचपन छूट गया धीरे धीरे
और मैं उस तारे को भूल गया
एक दिन अचानक कुछ दिन पहले वो मुझे फिर  दिखा
और देख के टिमटिमाया, जैसे वो मुझे पहचान गया 

फिर पता नहीं क्यूँ मुझे उसके बारे में पता करने का मन किया
पता चला की वो तारा तो सदियों पहले ही बुझ गया था
उसकी रोशनी है जो अभी भी सफ़र कर रही है बंजारों सी
न तो जिसका घर बचा है न ही मंजिल 

मैं भी टूट गया हूँ उस तारे की तरह 
मैं भी चला जाता हूँ किसी सफ़र को 
किसी के रोशनदान किसी की खिड़की से झाकुंगा
कोई तो खुश होगा मुझे देख के 
कोई तो तसल्लीबक्श सोयेगा मुझे देख के 










Tuesday, January 10, 2012

सिक्का

अजीब सा, प्यारा सा गाँव था हमारा
तीन तरफ जंगल  और एक तरफ से नदी से घिरा हुआ
पंखे नहीं थे घर पे, पर घर  की छत इतनी ऊँची और रोशनदान इतने सारे की
हवा भूल जाया करती थी की  आयी किस खिड़की से और जाना किस खिड़की से  था 

छत कबेलू की थी, जिस के  कंधे पे हाँथ रख के, अमरूद का पेड़ दोस्त की तरह खड़ा रहता था
जब कभी हम फल तोड़ने, पत्थर उछाल के थक जाते, तो कबेलू खुद ही सरका के एक आध अमरूद नीचे धकेल देता था 

रात को बाहर के आँगन में सोया करते करते थे सभी  
सुबह ५ बजे  जब बगल वाला श्याम चाचा तांगा लगाते
तो शोर से आँख खुल जाती थी
उनसे कोई पूछे की इतनी सुबह कहाँ जा रहे हो
तो बोलते सूरज को लाने जाना है 

हमारे घर से निकलता हुआ रस्ता, ढलान से होते हुए सीधे नदी को जाता था 
हम भी रोज़ नदी जाया करते थे
कभी नदी में कूदते,  कभी तेरते
कभी डूबते, कभी  नदी के किनारे दौड़ा करते थे 
और कभी पानी में हम सिक्का ढूँढने का खेल खेला करते थे
बड़ा अरसा हो गया, सुना है बरसो पहले वो नदी भी सूख गयी 
रेत तक उठा के ले गए, कुछ लोग घर बनाने 
जंगल भी कटते चले गए
लगता है सिक्का मिला नहीं अब  तक.........


Monday, December 5, 2011

सपने

हर बार जब भी कभी सपने में मिलते हो
तो मैं तुम्हे चिकोटी काट के  देखता हूँ की कहीं यह सपना तो नहीं है 

पता नहीं कितनी बार देखा है एक ही सपना
अब तो तुम्हारी बायीं बांह में चिकोतियों के नीले निशाँ भी साफ़ दीखते हैं
फिर  तुम्हे मैं जोर से अपनी बाहों में भर लेता हूँ
सपने में भी तुम्हे लगता होगा कितना पागल हूँ मैं

फिर हम बैठ के ढेर सारी दुनियाजहाँ  की  बातें करते हैं
पर तुम बार बार  आसमान की तरह देखती हो
जब मैं कहता हूँ की शाम होने में वक़्त है
तो तुम कहती हो की, बुद्धू  दिन होने को है

सुबह जब नींद टूटती है तो नजदीकियों का एहसास फासलों में बदल जाता है
और कुछ फासले मीलों में नहीं नपते, उनका पैमाना तो वक़्त भी नहीं हो सकता
अब मौत को कोसूं, की ज़िन्दगी से शिकायत करूँ
एक बार तुम्हे मौत ने जलाया और एक बार मुझे ज़िन्दगी खा गयी

Monday, November 14, 2011

बड़े छोटे हुआ करते थे वो दिन



बड़े छोटे हुआ करते थे वो दिन
बल्ला निकालते ही शाम हो जाया करती थी
और टीवी देखते ही रात हो जाया करती थी
पतंग का पीछा करो तो पता चलता था की घडी दीदी की तरह कमर में दुप्पटा घोंसे पीछे दौड़ रही है
की चलो पढाई का वक़्त हो गया

हल्ला करते हुए सुबह शाम स्कूल corridor में दौड़ना
और शोर करते हुए स्कूल से घर  दोस्तों के साथ साइकिल रेस करना
अब तो मैं काफी बड़ा हो गया हूँ,  दाढ़ी मूंछ भी सफ़ेद हो गयी है 
सोचता हूँ अगर फिर से वहां जाऊंगा तो क्या वो corridor या वो मुझे पहचानेगा 
नहीं पहचानेगा शायद, कितने सारे बच्चे गुज़रते थे रोज़ रोज़ 
बड़े छोटे हुआ करते थे वो दिन

कितना काम हुआ करता था पहले 
जैसे पूरा साल गर्मियों का इंतजार करना
पर उस से पहले गर्मियों के इम्तहान आ धमकते थे
अब भी जब मार्च आता है तो इम्तहान का अजीब सा डर लगता है
फिर आती थी गर्मियों की छुट्टियाँ 
सुबह जल्दी उठ ते  हुए इतना अच्छा कभी नहीं लगता था 
पर माँ के शब्दों में, गर्मियों की छुट्टियाँ गंगू बाई की तरह होती थी
१० मिनिट  में बर्तन साफ़, ११ मिनिट में रवाना 
बड़ी जल्दी चले गए वो दिन और वो गर्मियों की छुट्टियाँ
अब तो बस गर्मियां ही बची है 

बड़े छोटे हुआ करते थे वो दिन





 






Wednesday, November 9, 2011

Bachpan

खेल खेल मैं कल मुझे से 
कमरे का झूमर टूट गया
मम्मी से Promise किया था  मैंने की बड़ा होके Spiderman बनूँगा 
अब पापा देखेंगे तो कहेंगे की भैया नहीं चाहिए हमें ऐसा Spiderman

मम्मी पापा ने शायद शोर सुना नहीं या फिर दोनों टीवी लगा के सो गए थे

झूमर सफ़ेद और गोल थे एकदम, बिलकुल चाँद जैसा
हाँ, बिलकुल चाँद जैसा ही तो था
मैंने सोचा चाँद को आसमान से उतार के झूमर मैं लगा दूंगा
पापा को पता भी नहीं चलेगा
पहले मैं बालकनी में गया, पर लगा चाँद ऊपर है काफी
पर कल पापा को कहते सुना था की हम बड़े ऊँचे लोग हैं
पापा होते तो शायद चाँद बालकानी से उतार लेते
पर अब मुझे छज्जे तक जाना पड़ा
दबे पैर मैं छज्जे तक गया
पर चाँद तो उस से भी ऊँचा निकला
सोचा जब चाँद उन्गने लगेगा और मेरी तरह करवट बदलते वक़्त बिस्तर से गिर जायेगा तो झट से हवा में ही पकड़ लूँगा
तो इंतजार करते हुए मैं लेट गया
काफी इंतजार किया 
घडी का बड़ा कांता पहले तीन पे था अब देखो आठ पे आ गया था
पापा लाये थे Birthday पे radium  वाली घडी
फिर मुझे नींद आने लगी 
मैंने सोचा सो जाते हैं
कल पूछेंगे तो बोल दूंगा, की देर रात गए बच्चे पकड़ने वाला पोटली बाबा आया था
मैंने चिल्लाया पर आप लोग आये  ही नहीं
शोर सुना नहीं या फिर दोनों टीवी लगा के सो गए थे
फिर मैंने उसके सर पे झूमर फेंक के उसे डरा के भगा दिया
वो मान भी गए
जैसे पिछली बार दूध के ग्लास के बारे में मान गए थे


Sunday, November 6, 2011

इन्द्रधनुष

फिर निकला है वो इन्द्रधनुष
थोड़ी सी देर के लिए....... |

जब भी आसमान उदास होता है,
या फिर हवा की आँखों में
नमी होती है,
तो उसे सम्हालने चला आता है |
उस दिन कहने लगा
 "देखो
 कितने सारे रंग है फिर उदास क्यूँ हो
हरा नहीं चाहिए, तो नीला ले हो
लाल नहीं चाहिए, तो पीला ले लो
अगर और भी रंग चाहिए, तो मेरे सात रंगों
को जोड़ तोड़ के नए रंग बना लो"

" और अगर फिर भी दिल न माने
तो मेरे ऊपर  फिसलनी की तरह फिसल जाना
रंगों के लिए तो बहुत फिसले होगे
आज रंगों के ऊपर फिसल के देखो  |
बड़ा मज़ा आएगा,
और तुम जहाँ कहोगे वहां में तुम्हे छोड़ भी दूंगा "

"हाँ.... एक बात और भी है
यह रंग  थोड़े से कच्चे हैं मेरे,
पर मैं तो आता जाता रहता हूँ
फिर दे जाऊंगा, नए रंग तुम्हे
पर  अबकी बार मुझे बुलाने की लिए रोना मत
 सुना है दिल से हंसने से भी आँखें गीली होती हैं "