Tuesday, January 10, 2012

सिक्का

अजीब सा, प्यारा सा गाँव था हमारा
तीन तरफ जंगल  और एक तरफ से नदी से घिरा हुआ
पंखे नहीं थे घर पे, पर घर  की छत इतनी ऊँची और रोशनदान इतने सारे की
हवा भूल जाया करती थी की  आयी किस खिड़की से और जाना किस खिड़की से  था 

छत कबेलू की थी, जिस के  कंधे पे हाँथ रख के, अमरूद का पेड़ दोस्त की तरह खड़ा रहता था
जब कभी हम फल तोड़ने, पत्थर उछाल के थक जाते, तो कबेलू खुद ही सरका के एक आध अमरूद नीचे धकेल देता था 

रात को बाहर के आँगन में सोया करते करते थे सभी  
सुबह ५ बजे  जब बगल वाला श्याम चाचा तांगा लगाते
तो शोर से आँख खुल जाती थी
उनसे कोई पूछे की इतनी सुबह कहाँ जा रहे हो
तो बोलते सूरज को लाने जाना है 

हमारे घर से निकलता हुआ रस्ता, ढलान से होते हुए सीधे नदी को जाता था 
हम भी रोज़ नदी जाया करते थे
कभी नदी में कूदते,  कभी तेरते
कभी डूबते, कभी  नदी के किनारे दौड़ा करते थे 
और कभी पानी में हम सिक्का ढूँढने का खेल खेला करते थे
बड़ा अरसा हो गया, सुना है बरसो पहले वो नदी भी सूख गयी 
रेत तक उठा के ले गए, कुछ लोग घर बनाने 
जंगल भी कटते चले गए
लगता है सिक्का मिला नहीं अब  तक.........