Tuesday, October 30, 2012

औकात


कितना भी भर लूं ऊँची उड़ानें  आसमानों में
थक जाता हूँ तो ज़मीन पर ही मिलते हैं दो पल सुकून वाले
बड़े गहरे जवाब देता हूँ कोई जब पूछे की बात क्या है
खुद से पर कैसे छुपाऊ, मेरी औकात क्या है

लाख पाली दौलत हीरे जवाहरात वाली
पेट भरता है आज भी बस दाल चावल से
खाक पर  बैठा हूँ,कोई न पूछे जस्बात क्या है
खुद से पर कैसे छुपाऊ, मेरी औकात क्या है

जिस्म नाचते है शहर के सारे इशारों  पे मेरे
सुकून मिलता मगर थामता हाँथ मेरा प्यार से दो पल के लिए
जस्न छलावा  है , हर रात बारात क्या है
खुद से पर कैसे छुपाऊ, मेरी औकात क्या है



Monday, March 5, 2012

टूटा तारा

वो  तारा दोस्त था मेरा बचपन में
रोज़ सोने से पहले एक बार ज़रूर दिख जाया करता था
सर्दी में खिड़की के टूटे हुए कांच से झाँका करता था
और गर्मी में रोशनदान से 

फिर बचपन छूट गया धीरे धीरे
और मैं उस तारे को भूल गया
एक दिन अचानक कुछ दिन पहले वो मुझे फिर  दिखा
और देख के टिमटिमाया, जैसे वो मुझे पहचान गया 

फिर पता नहीं क्यूँ मुझे उसके बारे में पता करने का मन किया
पता चला की वो तारा तो सदियों पहले ही बुझ गया था
उसकी रोशनी है जो अभी भी सफ़र कर रही है बंजारों सी
न तो जिसका घर बचा है न ही मंजिल 

मैं भी टूट गया हूँ उस तारे की तरह 
मैं भी चला जाता हूँ किसी सफ़र को 
किसी के रोशनदान किसी की खिड़की से झाकुंगा
कोई तो खुश होगा मुझे देख के 
कोई तो तसल्लीबक्श सोयेगा मुझे देख के 










Tuesday, January 10, 2012

सिक्का

अजीब सा, प्यारा सा गाँव था हमारा
तीन तरफ जंगल  और एक तरफ से नदी से घिरा हुआ
पंखे नहीं थे घर पे, पर घर  की छत इतनी ऊँची और रोशनदान इतने सारे की
हवा भूल जाया करती थी की  आयी किस खिड़की से और जाना किस खिड़की से  था 

छत कबेलू की थी, जिस के  कंधे पे हाँथ रख के, अमरूद का पेड़ दोस्त की तरह खड़ा रहता था
जब कभी हम फल तोड़ने, पत्थर उछाल के थक जाते, तो कबेलू खुद ही सरका के एक आध अमरूद नीचे धकेल देता था 

रात को बाहर के आँगन में सोया करते करते थे सभी  
सुबह ५ बजे  जब बगल वाला श्याम चाचा तांगा लगाते
तो शोर से आँख खुल जाती थी
उनसे कोई पूछे की इतनी सुबह कहाँ जा रहे हो
तो बोलते सूरज को लाने जाना है 

हमारे घर से निकलता हुआ रस्ता, ढलान से होते हुए सीधे नदी को जाता था 
हम भी रोज़ नदी जाया करते थे
कभी नदी में कूदते,  कभी तेरते
कभी डूबते, कभी  नदी के किनारे दौड़ा करते थे 
और कभी पानी में हम सिक्का ढूँढने का खेल खेला करते थे
बड़ा अरसा हो गया, सुना है बरसो पहले वो नदी भी सूख गयी 
रेत तक उठा के ले गए, कुछ लोग घर बनाने 
जंगल भी कटते चले गए
लगता है सिक्का मिला नहीं अब  तक.........