कितना भी भर लूं ऊँची उड़ानें आसमानों में
थक जाता हूँ तो ज़मीन पर ही मिलते हैं दो पल सुकून वाले
बड़े गहरे जवाब देता हूँ कोई जब पूछे की बात क्या है
खुद से पर कैसे छुपाऊ, मेरी औकात क्या है
लाख पाली दौलत हीरे जवाहरात वाली
पेट भरता है आज भी बस दाल चावल से
खाक पर बैठा हूँ,कोई न पूछे जस्बात क्या है
खुद से पर कैसे छुपाऊ, मेरी औकात क्या है
जिस्म नाचते है शहर के सारे इशारों पे मेरे
सुकून मिलता मगर थामता हाँथ मेरा प्यार से दो पल के लिए
जस्न छलावा है , हर रात बारात क्या है
खुद से पर कैसे छुपाऊ, मेरी औकात क्या है