Wednesday, February 9, 2022

Mirage

 बहुत गर्म रेत थी, और भीतर थूक भी सूख चुका था 

मैं शायद वहीँ पे दम तोड़ देता 

पर वहीँ पास ही वो मुस्कुराता हुआ नीला उम्मीद का दरिया दिखा 

दूर से चिल्लाते हुए वोला "सुनो थोड़ा सा और चलो"

"देखो कितना ठंडा और मीठा पानी है मेरा "

"थक गए होगे, घर आओ ना , तुम भी तो पानी के ही बने हो "


मैंने हिम्मत बाँधी और थोड़ा चला, फिर कुछ और चला, फिर कुछ और

बहुत देर तक चला और बहुत दूर तक चला 

पर जितना भी चला वो दरिया हर बार उतनी ही दूर दिखा 

रस्ते में लगभग सूखे हुए कुवें मिले 

हर बार उतना ही पानी मिला जो मुझे ज़िंदा रख सके 

रस्ते में कई मुसाफिर भी मिले, सबने कहा की वो दरिया झूठा है 

नाम भी रखा था उन्होंने उस दरिया का, कुछ ने मृगतृष्णा बोला, कुछ ने सराब और कुछ ने Mirage 


दिन फिर चढ़ गया है, रेत फिर बहुत गर्म हो गयी है और भीतर थूकः फिर सूख चुका है 

एक सच यह है  की अगर में रुक जाऊ तो यह प्यास का सिलसिला खतम हो जायेगा, मेरे साथ ही 

एक झूठ भी है, यह दरिया, जो फिर बुला रहा है मुस्कुराते हुए

कह रहा है , घर आओ जल्दी।। 

Wednesday, May 6, 2020

आम का आचार

वहां सब  मिलता है माँ
मैंने झुंझलाते हुए कहा ,
और ऊपर से मेरे कपड़ो से भी अचार की बदबू आने लगेगी |

बदबू !!!! ?!!  मैंने देख  तेरे लिए कितने प्यार से बनाया है,
लेजा न प्लीज , माँ ऐसे गिडगिडाके बोली जैसे मैं एहसान करूँगा आम का अचार साथ ले जा के |

हमेशा ऐसा ही करती थी वो
कभी नहीं सुनती थी मेरी
यह ले जाओ, वो ले जाओ
चुपके से बिना पूछे कभी कभी बैग में कभी कंगी , कभी बोरोप्लस रख देती थी
कुछ बात नहीं मानती थी मेरी
जबकि हमेशा समझाता था मैं उसे की वहां सब मिलता है।


आज रेल गाडी का वक़्त हो रहा है मेरी
आज लग रहा था की कोई जबरजस्ती बैग में कुछ रख दे तो अपनापन सा लगे
कोई तो कंघी, रुमाल , झंडू बाम रख दे , या वही आम का आचार ,
हाँ तो आने दो न कपड़ो से आचार की खुशबू |
पर आज नहीं था आम का आचार
मैंने आखिरी बार खाली किचन को देखा और स्टेशन की तरफ चल दिया
सच तो है वहां सब मिलता है, पर अब तुम कहीं नहीं मिलोगी माँ ||



Saturday, January 3, 2015

म्यूजियम

बड़ी सी एक ईमारत
कुछ नाराज़ सी
कुछ उदास सी
कुछ खुश सी
कुछ उदास सी
दूसरी इमारतों की तरह उसमे लोग नहीं रहते थे
बस कुछ चीज़ें थी, पुरानी सी।

जैसे एक टुटा हुआ मोतियों वाला गुलाबी कंगन
जिसके पीछे पता नहीं कितनी कसमों ने दम तोडा
पता नहीं कितने दिल टूटे
और पता नहीं कितने लोग फिर मिटटी में मिल गए
आज पांच सौ साल बाद यहाँ एक चबूतरे के ऊपर पड़ा है
अजीब सी कहानी है उस हाँथ के कंगन की
चबूतरे के ऊपर लिखा है की कंगन को हाँथ लगाना मना है।

एक हिरन के चमड़े से बना एक बस्ता
जिसे किसी ने महीने भर की मजदूरी से ख़रीदा था
अपनी छोटी सी उम्र में बड़े प्यार से रखा था वो बस्ता
फिर एक रात एक सराय में किसी ने उसका गला दबा के वो बस्ता चुरा लिया
वहां से एक हाँथ से दूसरे उस बस्ते का सफ़र शुरू हुआ
अब छ सौ साल की उम्र में यहाँ आराम कर रहा है
बस्ता खोलोगे तो ठूंस ठूंस के भरी हुई ढेर सारी कहानियां बाहर निकल पड़ेंगी
अगर खोल पाये तो क्योंकि बस्ते को भी हाँथ लगाना मना है।

एक छोटी सी पथ्थर की स्लेट है
उसके बाबा ने मेले से खरीदी थी उसके लिए 700 साल पहले
उसकी नन्ही नन्ही उँगलियों ने बहुत कुछ लिखा था उस पे
अपना नाम, बाबा का नाम, अम्मा का नाम, गांव का नाम
वो नन्ही उँगलियाँ धीरे धीरे बड़ी हुई, फिर बूढी और फिर एक दिन गायब हो गयी
उस स्लेट पे अब कोई नहीं लिखता
ना उसके गांव का नाम, ना अम्मा का नाम, ना बाबा का नाम और ना ही उसका नाम
उस स्लेट को सुघोंगे तो आज भी उसके गिरे हुए कैरी के आचार की खुश्बू आएगी
उसे हाँथ लगाओगे तो शायद सदियों पहले जिए उस मासूम की छुवन महसूस होगी
अगर छु सके तो क्योंकि उस स्लेट को छूना मना है

और भी है कई सारी छोटी बड़ी सायानी चीजें
सब एक से एक कहानियां लिए हुए
एक किताब सी है वो,सबकी कहानियां समेटे हुए
भले ही लोग उसे ईमारत कहे भले ही लोग उसे Museum कहे।।

Tuesday, June 17, 2014

छम छम वाली बारिश

काम करते-करते अचानक नज़र खिड़की पे गयी
काले बादल, बिजलियों की रोशनी और बारिश हो रही थी
छम छम वाली बारिश

हलाकि AC के कारण खिडकियों पे पुख्ता कांच थे, पर बिना आवाज़ सुने ही पहचान जाता हूँ इसे
छम छम वाली बारिश

साठ के दशक के सिनेमा में कभी जब हीरो पार्टी में गाना गाता था, तो एक एक्स्ट्रा हुआ करती थी उस गाने में,
जो बिना सुर ताल अपनी ही धुन में नाचती थी।
जैसे उसे अपना सारा हुनर एक ही गाने में दिखा के लोगों से लोहा मनवाना है।
कुछ वैसी ही होती है छम छम वाली बारिश,
बिलकुल Show Off
पर जैसी भी हो, होती बड़ी मजेदार है
एक ही झटके में सब हरा सा हो जाता है,
सड़कें तालाब हो जाती है
और जब बारिश खत्म होती है
तो सारे पक्षी बहार गाना गाके जशन सा मनाते है।

थोडा सा मन किया मेरा
टाई को थोडा ढीला कर, चमड़े के जूते में बाहर निकलू और सारे कपडे गीले कर लूँ।
पर सब पागल समझेंगे मुझे।
ऐसा तो बस फिल्मों में ही अच्छा लगता है।
फिर मेरी उम्र भी हो गयी है
यह सोच खुद को रोक लिया।

शाम को घर निकलते वक़्त खिड़की से झाँक के देखा
लगता है फिर होगी छम छम वाली बारिश।
जल्दी से फाइल्स बंद की और तेज़ कदमों से में बाहर चल पड़ा
पीछे से आवाज़ आयी
"सर, छाता भूल के जा रहे हैं आप"
मुस्कुराके, सुना अनसुना करते हुए बाहर आया।
छम छम वाली बारिश बस शुरू होने को ही है।

Thursday, February 20, 2014

लहरें

किनारे पे खड़े तुम्हे देखते ही,
खुशी से मेरी श़क्ल बनने लगी ।
तेज़ी से दौड़ता हुआ
तुम्हारी तरफ चल पड़ा ।
और जब तुमसे टकराया
तो सब टूट गया
मेरे दुःख,
मेरे दर्द,
मेरी परेशानी,
मेरा बीता हुआ कल,
मेरा आने वाला कल ।
बचा केवल पानी, खामोश पानी ।
जाते जाते धीरे से तुम्हे गले लगाया,
फिर हलके से तुम्हारा माथा चूमा,
और अलविदा कह के गुम हो गया समंदर में ।
बस इतनी सी थी मेरी ज़िन्दगी ।

कई बार सोचा
अगर में वहीँ रुक जाता तो ??
कुछ और जी जाता तो ??
फिर सोचा
ऐसा होता तो वहां मैं, मैं नहीं होता
जो होता सच नहीं होता
और देखो, मेरा सच तो वोही है
मेरी हद
मेरी सीमा
मेरा किनारा।

किस्से कहानियों में नहीं मिलेगी,
कभी खोजनी हो मेरी ज़िन्दगी
तो उन्ही किनारों में ढूँढना ।
उन किनारों के पथ्थरों पे पड़े आड़े तिरछे निशानों पे
जिन्हें मैंने छुआ था कभी
जब मैं जिया था
जब मैं लहर था ।।

Friday, June 14, 2013

वो मकान



हरे भरे पहाड़ों के बीच एक नीली झील थी
झील के एक तरफ हरा भरा मैदान था, जिसके परे घना जंगल था
गर्मी में उस जंगल के सभी पेड़ों के पत्ते पीले  हो जाया  करते थे
और सर्दियों में उस मैदान की घास, लाल रंग के  छोटे छोटे फूलों से भर जाया करती थी ॥
झील के दूसरे तरफ लकड़ी  का एक घर था
बड़ा अजीब सा घर था
उस घर में न कोई खिड़की थी
न कोई दरवाज़ा
घर के एक तरफ एक दरार थी,
जहाँ से शायद झील और पहाड़ी दिखते हो ॥
उस दरार में से कभी कभी एक जोड़ी आँखे झाँका करती थी
और कभी कभी दो तीन नन्ही गोरी उँगलियाँ निकला करती थी
कटे हुए नाखू और एकदम साफ़ सुथरी धूली हुई उँगलियाँ
जिसकी सबसे छोटी ऊँगली में हरे रंग की रूबी की अंगूठी  थी ॥

फिर वो उँगलियाँ निकलना बंद  हो गयी
और मैं भी अपने काम में मसरूफ हो गया
वोही रोज़ का काम
सुबह सूरज जलाना
शाम को बुझाना
बादल लाना
बारिश लाना
चाँद के लालटेन में तेल भरना
और भी एक हज़ार छोटे बड़े काम ॥

फिर बरसो बाद एक दिन अचानक पता नहीं क्या सूझी
मैं उस घर की तरफ चल पड़ा
घर के आसपास कोई नहीं था
हलके पैरों से जाके मैंने उस दरार से झाँका
सामने की तरफ मुझे एक तिजोरी दिखी
आधी खुली हुई
कुछ चमक रहा था उसमे
कुछ हीरे मोती जैसा
पास  ही दीवार पे एक आला था
जिसमे कुछ खिलोने पड़े धुल खा रहे थे
वो  खिलोने जो कभी ज़मीन पे बिखरे रहते होंगे 
बचपन गुज़र गया, मैंने सोचा ॥
पास में बिस्तर लगा था
कोई लेटा था सतरंगी लोई पहन के
फिर मेरी नज़र लोई से झांकते हुए हाँथ पे पड़ी
हाँथ कभी रहा होगा
अब सिर्फ हड्डियाँ बची थी
जिसकी सबसे छोटी ऊँगली में हरे रंग की रूबी की अंगूठी  थी ॥



Thursday, June 13, 2013

रैनी डे

सारी रात हलचल रही
जैसे बादलों की बैठक में
     गरमा गरम बहस चल रही हो
रात भर वो एक दुसरे पे गरजते  रहे
    और एक दुसरे पे ज़ोरदार छींटअ कशी करते रहे

उस शोर शराबे के बीच
     पता ही नहीं चला, नींद न जाने कब लग गयी
जब आँख खुली तो बड़े आहिस्ता से बारिश हो रही हो
     जैसे रात के शोर के लिए शर्मिंदा रही हो

हाँ तो?!!, शर्मिंदा तो  हो होना ही चाहिए
सब की नींद ख़राब कर दी
सूरज अभी भी बादल ताने सो रहा है
पंछियों ने भी घोसला नहीं छोड़ा है
आज लोग नहीं पानी सड़क पे चल रहा है
सुबह का अखवार भी देखो गीला कर दिया
हाँ तो?!!, शर्मिंदा तो  हो होना ही चाहिए

फिर मेरी नज़र कांच की खिड़की पे गयी जिसपे हलकी सी धुंद है
उस पे छोटी छोटी उँगलियों से एक मुस्कुराता हुआ चेहरा बना है
रैनी डे है आज