बहुत गर्म रेत थी, और भीतर थूक भी सूख चुका था
मैं शायद वहीँ पे दम तोड़ देता
पर वहीँ पास ही वो मुस्कुराता हुआ नीला उम्मीद का दरिया दिखा
दूर से चिल्लाते हुए वोला "सुनो थोड़ा सा और चलो"
"देखो कितना ठंडा और मीठा पानी है मेरा "
"थक गए होगे, घर आओ ना , तुम भी तो पानी के ही बने हो "
मैंने हिम्मत बाँधी और थोड़ा चला, फिर कुछ और चला, फिर कुछ और
बहुत देर तक चला और बहुत दूर तक चला
पर जितना भी चला वो दरिया हर बार उतनी ही दूर दिखा
रस्ते में लगभग सूखे हुए कुवें मिले
हर बार उतना ही पानी मिला जो मुझे ज़िंदा रख सके
रस्ते में कई मुसाफिर भी मिले, सबने कहा की वो दरिया झूठा है
नाम भी रखा था उन्होंने उस दरिया का, कुछ ने मृगतृष्णा बोला, कुछ ने सराब और कुछ ने Mirage
दिन फिर चढ़ गया है, रेत फिर बहुत गर्म हो गयी है और भीतर थूकः फिर सूख चुका है
एक सच यह है की अगर में रुक जाऊ तो यह प्यास का सिलसिला खतम हो जायेगा, मेरे साथ ही
एक झूठ भी है, यह दरिया, जो फिर बुला रहा है मुस्कुराते हुए
कह रहा है , घर आओ जल्दी।।

