हरे भरे पहाड़ों के बीच एक नीली झील थी
झील के एक तरफ हरा भरा मैदान था, जिसके परे घना जंगल था
गर्मी में उस जंगल के सभी पेड़ों के पत्ते पीले हो जाया करते थे
और सर्दियों में उस मैदान की घास, लाल रंग के छोटे छोटे फूलों से भर जाया करती थी ॥
झील के दूसरे तरफ लकड़ी का एक घर था
बड़ा अजीब सा घर था
उस घर में न कोई खिड़की थी
न कोई दरवाज़ा
घर के एक तरफ एक दरार थी,
जहाँ से शायद झील और पहाड़ी दिखते हो ॥
उस दरार में से कभी कभी एक जोड़ी आँखे झाँका करती थी
और कभी कभी दो तीन नन्ही गोरी उँगलियाँ निकला करती थी
कटे हुए नाखू और एकदम साफ़ सुथरी धूली हुई उँगलियाँ
जिसकी सबसे छोटी ऊँगली में हरे रंग की रूबी की अंगूठी थी ॥
फिर वो उँगलियाँ निकलना बंद हो गयी
और मैं भी अपने काम में मसरूफ हो गया
वोही रोज़ का काम
सुबह सूरज जलाना
शाम को बुझाना
बादल लाना
बारिश लाना
चाँद के लालटेन में तेल भरना
और भी एक हज़ार छोटे बड़े काम ॥
फिर बरसो बाद एक दिन अचानक पता नहीं क्या सूझी
मैं उस घर की तरफ चल पड़ा
घर के आसपास कोई नहीं था
हलके पैरों से जाके मैंने उस दरार से झाँका
सामने की तरफ मुझे एक तिजोरी दिखी
आधी खुली हुई
कुछ चमक रहा था उसमे
कुछ हीरे मोती जैसा
पास ही दीवार पे एक आला था
जिसमे कुछ खिलोने पड़े धुल खा रहे थे
वो खिलोने जो कभी ज़मीन पे बिखरे रहते होंगे
बचपन गुज़र गया, मैंने सोचा ॥
पास में बिस्तर लगा था
कोई लेटा था सतरंगी लोई पहन के
फिर मेरी नज़र लोई से झांकते हुए हाँथ पे पड़ी
हाँथ कभी रहा होगा
अब सिर्फ हड्डियाँ बची थी
जिसकी सबसे छोटी ऊँगली में हरे रंग की रूबी की अंगूठी थी ॥

good one
ReplyDelete