Thursday, June 13, 2013

रैनी डे

सारी रात हलचल रही
जैसे बादलों की बैठक में
     गरमा गरम बहस चल रही हो
रात भर वो एक दुसरे पे गरजते  रहे
    और एक दुसरे पे ज़ोरदार छींटअ कशी करते रहे

उस शोर शराबे के बीच
     पता ही नहीं चला, नींद न जाने कब लग गयी
जब आँख खुली तो बड़े आहिस्ता से बारिश हो रही हो
     जैसे रात के शोर के लिए शर्मिंदा रही हो

हाँ तो?!!, शर्मिंदा तो  हो होना ही चाहिए
सब की नींद ख़राब कर दी
सूरज अभी भी बादल ताने सो रहा है
पंछियों ने भी घोसला नहीं छोड़ा है
आज लोग नहीं पानी सड़क पे चल रहा है
सुबह का अखवार भी देखो गीला कर दिया
हाँ तो?!!, शर्मिंदा तो  हो होना ही चाहिए

फिर मेरी नज़र कांच की खिड़की पे गयी जिसपे हलकी सी धुंद है
उस पे छोटी छोटी उँगलियों से एक मुस्कुराता हुआ चेहरा बना है
रैनी डे है आज

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