Monday, November 14, 2011

बड़े छोटे हुआ करते थे वो दिन



बड़े छोटे हुआ करते थे वो दिन
बल्ला निकालते ही शाम हो जाया करती थी
और टीवी देखते ही रात हो जाया करती थी
पतंग का पीछा करो तो पता चलता था की घडी दीदी की तरह कमर में दुप्पटा घोंसे पीछे दौड़ रही है
की चलो पढाई का वक़्त हो गया

हल्ला करते हुए सुबह शाम स्कूल corridor में दौड़ना
और शोर करते हुए स्कूल से घर  दोस्तों के साथ साइकिल रेस करना
अब तो मैं काफी बड़ा हो गया हूँ,  दाढ़ी मूंछ भी सफ़ेद हो गयी है 
सोचता हूँ अगर फिर से वहां जाऊंगा तो क्या वो corridor या वो मुझे पहचानेगा 
नहीं पहचानेगा शायद, कितने सारे बच्चे गुज़रते थे रोज़ रोज़ 
बड़े छोटे हुआ करते थे वो दिन

कितना काम हुआ करता था पहले 
जैसे पूरा साल गर्मियों का इंतजार करना
पर उस से पहले गर्मियों के इम्तहान आ धमकते थे
अब भी जब मार्च आता है तो इम्तहान का अजीब सा डर लगता है
फिर आती थी गर्मियों की छुट्टियाँ 
सुबह जल्दी उठ ते  हुए इतना अच्छा कभी नहीं लगता था 
पर माँ के शब्दों में, गर्मियों की छुट्टियाँ गंगू बाई की तरह होती थी
१० मिनिट  में बर्तन साफ़, ११ मिनिट में रवाना 
बड़ी जल्दी चले गए वो दिन और वो गर्मियों की छुट्टियाँ
अब तो बस गर्मियां ही बची है 

बड़े छोटे हुआ करते थे वो दिन





 






Wednesday, November 9, 2011

Bachpan

खेल खेल मैं कल मुझे से 
कमरे का झूमर टूट गया
मम्मी से Promise किया था  मैंने की बड़ा होके Spiderman बनूँगा 
अब पापा देखेंगे तो कहेंगे की भैया नहीं चाहिए हमें ऐसा Spiderman

मम्मी पापा ने शायद शोर सुना नहीं या फिर दोनों टीवी लगा के सो गए थे

झूमर सफ़ेद और गोल थे एकदम, बिलकुल चाँद जैसा
हाँ, बिलकुल चाँद जैसा ही तो था
मैंने सोचा चाँद को आसमान से उतार के झूमर मैं लगा दूंगा
पापा को पता भी नहीं चलेगा
पहले मैं बालकनी में गया, पर लगा चाँद ऊपर है काफी
पर कल पापा को कहते सुना था की हम बड़े ऊँचे लोग हैं
पापा होते तो शायद चाँद बालकानी से उतार लेते
पर अब मुझे छज्जे तक जाना पड़ा
दबे पैर मैं छज्जे तक गया
पर चाँद तो उस से भी ऊँचा निकला
सोचा जब चाँद उन्गने लगेगा और मेरी तरह करवट बदलते वक़्त बिस्तर से गिर जायेगा तो झट से हवा में ही पकड़ लूँगा
तो इंतजार करते हुए मैं लेट गया
काफी इंतजार किया 
घडी का बड़ा कांता पहले तीन पे था अब देखो आठ पे आ गया था
पापा लाये थे Birthday पे radium  वाली घडी
फिर मुझे नींद आने लगी 
मैंने सोचा सो जाते हैं
कल पूछेंगे तो बोल दूंगा, की देर रात गए बच्चे पकड़ने वाला पोटली बाबा आया था
मैंने चिल्लाया पर आप लोग आये  ही नहीं
शोर सुना नहीं या फिर दोनों टीवी लगा के सो गए थे
फिर मैंने उसके सर पे झूमर फेंक के उसे डरा के भगा दिया
वो मान भी गए
जैसे पिछली बार दूध के ग्लास के बारे में मान गए थे


Sunday, November 6, 2011

इन्द्रधनुष

फिर निकला है वो इन्द्रधनुष
थोड़ी सी देर के लिए....... |

जब भी आसमान उदास होता है,
या फिर हवा की आँखों में
नमी होती है,
तो उसे सम्हालने चला आता है |
उस दिन कहने लगा
 "देखो
 कितने सारे रंग है फिर उदास क्यूँ हो
हरा नहीं चाहिए, तो नीला ले हो
लाल नहीं चाहिए, तो पीला ले लो
अगर और भी रंग चाहिए, तो मेरे सात रंगों
को जोड़ तोड़ के नए रंग बना लो"

" और अगर फिर भी दिल न माने
तो मेरे ऊपर  फिसलनी की तरह फिसल जाना
रंगों के लिए तो बहुत फिसले होगे
आज रंगों के ऊपर फिसल के देखो  |
बड़ा मज़ा आएगा,
और तुम जहाँ कहोगे वहां में तुम्हे छोड़ भी दूंगा "

"हाँ.... एक बात और भी है
यह रंग  थोड़े से कच्चे हैं मेरे,
पर मैं तो आता जाता रहता हूँ
फिर दे जाऊंगा, नए रंग तुम्हे
पर  अबकी बार मुझे बुलाने की लिए रोना मत
 सुना है दिल से हंसने से भी आँखें गीली होती हैं "