और घबरा के मैंने आँखें बंद कर ली
आँखें खोली तो सब बदल गया था
आंधी नहीं थी
तुम नहीं थे
मैं नहीं था
और वक़्त भी नहीं था
मेरी अनाथ आँख उस तरफ एक कोने में पड़ी थी
धूल से सनी हुई, कांच के एक टुकड़े के पास
फिर फीकी धुप में हलकी सी बारिश शुरू हो गयी
और एक छोटा सा इन्द्रधनुष निकल आया ऊँचे आसमान में
सब कुछ बड़ा सुन्दर सा था
मैंने कांच से पूछा, "कैसा जीया मैं ?"
कांच का टुकड़ा बोला, "मैं कैसा जीया ?"
मैंने कहा "पता नहीं पर तस्वीर तो तुम अभी थी दिखाते हो "
कांच मुस्कुरा के बोला,
"वो देखो शाम हो चली है
अनाथ आँखों को बटोरने, वो लोग आते ही होंगे
कोई पूछे क्या देखा अंतिम बार
तो कहना सारे रंग थे इन्द्रधनुष में "
