Monday, January 7, 2013

आँख

एक बार बड़ी जोर से वक़्त की आंधी चली
और घबरा के मैंने आँखें बंद कर ली 

आँखें खोली तो सब बदल गया था 
आंधी नहीं थी 
तुम नहीं थे 
मैं नहीं था 
और वक़्त भी नहीं था 
मेरी अनाथ आँख उस तरफ एक कोने में पड़ी थी
धूल  से सनी हुई, कांच के एक टुकड़े के पास 

फिर फीकी धुप में हलकी सी बारिश शुरू हो गयी 
और एक छोटा सा इन्द्रधनुष निकल आया ऊँचे आसमान में 
सब कुछ बड़ा सुन्दर सा था 
मैंने कांच से पूछा, "कैसा जीया मैं ?"
कांच का टुकड़ा बोला, "मैं कैसा जीया  ?"
मैंने कहा "पता नहीं पर तस्वीर तो तुम अभी थी दिखाते हो "
कांच मुस्कुरा  के बोला, 
"वो देखो शाम हो चली है 
अनाथ आँखों को बटोरने, वो लोग आते ही होंगे 
कोई पूछे क्या देखा अंतिम बार 
तो कहना सारे रंग  थे इन्द्रधनुष में "