Monday, March 5, 2012

टूटा तारा

वो  तारा दोस्त था मेरा बचपन में
रोज़ सोने से पहले एक बार ज़रूर दिख जाया करता था
सर्दी में खिड़की के टूटे हुए कांच से झाँका करता था
और गर्मी में रोशनदान से 

फिर बचपन छूट गया धीरे धीरे
और मैं उस तारे को भूल गया
एक दिन अचानक कुछ दिन पहले वो मुझे फिर  दिखा
और देख के टिमटिमाया, जैसे वो मुझे पहचान गया 

फिर पता नहीं क्यूँ मुझे उसके बारे में पता करने का मन किया
पता चला की वो तारा तो सदियों पहले ही बुझ गया था
उसकी रोशनी है जो अभी भी सफ़र कर रही है बंजारों सी
न तो जिसका घर बचा है न ही मंजिल 

मैं भी टूट गया हूँ उस तारे की तरह 
मैं भी चला जाता हूँ किसी सफ़र को 
किसी के रोशनदान किसी की खिड़की से झाकुंगा
कोई तो खुश होगा मुझे देख के 
कोई तो तसल्लीबक्श सोयेगा मुझे देख के