Monday, December 5, 2011

सपने

हर बार जब भी कभी सपने में मिलते हो
तो मैं तुम्हे चिकोटी काट के  देखता हूँ की कहीं यह सपना तो नहीं है 

पता नहीं कितनी बार देखा है एक ही सपना
अब तो तुम्हारी बायीं बांह में चिकोतियों के नीले निशाँ भी साफ़ दीखते हैं
फिर  तुम्हे मैं जोर से अपनी बाहों में भर लेता हूँ
सपने में भी तुम्हे लगता होगा कितना पागल हूँ मैं

फिर हम बैठ के ढेर सारी दुनियाजहाँ  की  बातें करते हैं
पर तुम बार बार  आसमान की तरह देखती हो
जब मैं कहता हूँ की शाम होने में वक़्त है
तो तुम कहती हो की, बुद्धू  दिन होने को है

सुबह जब नींद टूटती है तो नजदीकियों का एहसास फासलों में बदल जाता है
और कुछ फासले मीलों में नहीं नपते, उनका पैमाना तो वक़्त भी नहीं हो सकता
अब मौत को कोसूं, की ज़िन्दगी से शिकायत करूँ
एक बार तुम्हे मौत ने जलाया और एक बार मुझे ज़िन्दगी खा गयी