Tuesday, June 4, 2013

वक़्त चोर

एक सुबह जब मैं आईने के सामने बाल बना रहा था
तो मुझे लगा आईने के अंदर कुछ हिला

 गौर से देखने जब करीब जाके आईने को हाँथ लगाया
तो लगा जैसे आइना ठोस  नहीं बल्कि दलदली है

फिर अचानक आईने में से दो हाँथ बाहर  निकले और मुझे अंदर खींचने लगे
बड़े मजबूत हाथ थे वो
बड़ी जद्दोजहत करनी पड़ी खुद को छुडाने में

कितना वक़्त लगा, बताना मुश्किल  है
पर जब मैंने फिर आइना देखा,
तो मेरे बाल सफ़ेद हो गए थे और चेहरे पे एक हज़ार झुर्रियां पड़ी थी

मैंने घबरा के आईने से चीख के पूछा
"यह क्या कर दिया तुमने"

आइना बोला  "मैंने क्या किया?!!,
वक़्त का हिसाब तो तुमने नहीं रखा,
आईने में  वो शख्स  तुम ही तो  थे
खुद से ही तो उलझे रहे इतने सालों "॥

Wednesday, April 17, 2013

खालीपन










इस्त्री की हुए तुम्हारी पोशाकें ,
ज्यों का त्यों अलमारी में रखी हुई हैं ।
हाँथ लगाने से डर  लगता है,
कहीं तह के  साथ तुम्हारी याद भी न टूट जाये ।

वो तुम्हारे महंगे जूते, जो हमें बहुत पसंद थे
एक दो बार पोशीदा भी रखे
पर तुमने उसे ढूँढ निकाला
आज भी कीचड़ से सने उस कोने में रखे हैं
जैसा की तुमने पहन के रख छोड़े थे आखिरी दिन ।

वो कहते हैं अब तुम रिहा हो  सबसे
मुझे भी रिहा कर दो मेरे भाई
तुम्हारे रूमाल से, तुम्हारे मोबाइल से
तुमसे जुडी तुम्हारी सारी  चीज़ों से
उन  गानों से जो हमने साथ में  सुने  थे
उन फिल्मों से जो हमने साथ में देखी थी
वो सारी  जगहों से जहाँ हम साथ जीये थे

घर बदल दूं , तुम्हारी चीजें दरिया में बहा दूँ
पर तुम्हारा हिस्सा  जो मुझसे जुदा है, उसका क्या
या चलो एक खेल खेलते हैं
मैं गिनती गिनता हूँ, सोचूंगा तुम छुपे हो
और कभी गिनती गिनना  कभी बंद नहीं करूँगा ॥

Monday, January 7, 2013

आँख

एक बार बड़ी जोर से वक़्त की आंधी चली
और घबरा के मैंने आँखें बंद कर ली 

आँखें खोली तो सब बदल गया था 
आंधी नहीं थी 
तुम नहीं थे 
मैं नहीं था 
और वक़्त भी नहीं था 
मेरी अनाथ आँख उस तरफ एक कोने में पड़ी थी
धूल  से सनी हुई, कांच के एक टुकड़े के पास 

फिर फीकी धुप में हलकी सी बारिश शुरू हो गयी 
और एक छोटा सा इन्द्रधनुष निकल आया ऊँचे आसमान में 
सब कुछ बड़ा सुन्दर सा था 
मैंने कांच से पूछा, "कैसा जीया मैं ?"
कांच का टुकड़ा बोला, "मैं कैसा जीया  ?"
मैंने कहा "पता नहीं पर तस्वीर तो तुम अभी थी दिखाते हो "
कांच मुस्कुरा  के बोला, 
"वो देखो शाम हो चली है 
अनाथ आँखों को बटोरने, वो लोग आते ही होंगे 
कोई पूछे क्या देखा अंतिम बार 
तो कहना सारे रंग  थे इन्द्रधनुष में "










Tuesday, October 30, 2012

औकात


कितना भी भर लूं ऊँची उड़ानें  आसमानों में
थक जाता हूँ तो ज़मीन पर ही मिलते हैं दो पल सुकून वाले
बड़े गहरे जवाब देता हूँ कोई जब पूछे की बात क्या है
खुद से पर कैसे छुपाऊ, मेरी औकात क्या है

लाख पाली दौलत हीरे जवाहरात वाली
पेट भरता है आज भी बस दाल चावल से
खाक पर  बैठा हूँ,कोई न पूछे जस्बात क्या है
खुद से पर कैसे छुपाऊ, मेरी औकात क्या है

जिस्म नाचते है शहर के सारे इशारों  पे मेरे
सुकून मिलता मगर थामता हाँथ मेरा प्यार से दो पल के लिए
जस्न छलावा  है , हर रात बारात क्या है
खुद से पर कैसे छुपाऊ, मेरी औकात क्या है



Monday, March 5, 2012

टूटा तारा

वो  तारा दोस्त था मेरा बचपन में
रोज़ सोने से पहले एक बार ज़रूर दिख जाया करता था
सर्दी में खिड़की के टूटे हुए कांच से झाँका करता था
और गर्मी में रोशनदान से 

फिर बचपन छूट गया धीरे धीरे
और मैं उस तारे को भूल गया
एक दिन अचानक कुछ दिन पहले वो मुझे फिर  दिखा
और देख के टिमटिमाया, जैसे वो मुझे पहचान गया 

फिर पता नहीं क्यूँ मुझे उसके बारे में पता करने का मन किया
पता चला की वो तारा तो सदियों पहले ही बुझ गया था
उसकी रोशनी है जो अभी भी सफ़र कर रही है बंजारों सी
न तो जिसका घर बचा है न ही मंजिल 

मैं भी टूट गया हूँ उस तारे की तरह 
मैं भी चला जाता हूँ किसी सफ़र को 
किसी के रोशनदान किसी की खिड़की से झाकुंगा
कोई तो खुश होगा मुझे देख के 
कोई तो तसल्लीबक्श सोयेगा मुझे देख के 










Tuesday, January 10, 2012

सिक्का

अजीब सा, प्यारा सा गाँव था हमारा
तीन तरफ जंगल  और एक तरफ से नदी से घिरा हुआ
पंखे नहीं थे घर पे, पर घर  की छत इतनी ऊँची और रोशनदान इतने सारे की
हवा भूल जाया करती थी की  आयी किस खिड़की से और जाना किस खिड़की से  था 

छत कबेलू की थी, जिस के  कंधे पे हाँथ रख के, अमरूद का पेड़ दोस्त की तरह खड़ा रहता था
जब कभी हम फल तोड़ने, पत्थर उछाल के थक जाते, तो कबेलू खुद ही सरका के एक आध अमरूद नीचे धकेल देता था 

रात को बाहर के आँगन में सोया करते करते थे सभी  
सुबह ५ बजे  जब बगल वाला श्याम चाचा तांगा लगाते
तो शोर से आँख खुल जाती थी
उनसे कोई पूछे की इतनी सुबह कहाँ जा रहे हो
तो बोलते सूरज को लाने जाना है 

हमारे घर से निकलता हुआ रस्ता, ढलान से होते हुए सीधे नदी को जाता था 
हम भी रोज़ नदी जाया करते थे
कभी नदी में कूदते,  कभी तेरते
कभी डूबते, कभी  नदी के किनारे दौड़ा करते थे 
और कभी पानी में हम सिक्का ढूँढने का खेल खेला करते थे
बड़ा अरसा हो गया, सुना है बरसो पहले वो नदी भी सूख गयी 
रेत तक उठा के ले गए, कुछ लोग घर बनाने 
जंगल भी कटते चले गए
लगता है सिक्का मिला नहीं अब  तक.........


Monday, December 5, 2011

सपने

हर बार जब भी कभी सपने में मिलते हो
तो मैं तुम्हे चिकोटी काट के  देखता हूँ की कहीं यह सपना तो नहीं है 

पता नहीं कितनी बार देखा है एक ही सपना
अब तो तुम्हारी बायीं बांह में चिकोतियों के नीले निशाँ भी साफ़ दीखते हैं
फिर  तुम्हे मैं जोर से अपनी बाहों में भर लेता हूँ
सपने में भी तुम्हे लगता होगा कितना पागल हूँ मैं

फिर हम बैठ के ढेर सारी दुनियाजहाँ  की  बातें करते हैं
पर तुम बार बार  आसमान की तरह देखती हो
जब मैं कहता हूँ की शाम होने में वक़्त है
तो तुम कहती हो की, बुद्धू  दिन होने को है

सुबह जब नींद टूटती है तो नजदीकियों का एहसास फासलों में बदल जाता है
और कुछ फासले मीलों में नहीं नपते, उनका पैमाना तो वक़्त भी नहीं हो सकता
अब मौत को कोसूं, की ज़िन्दगी से शिकायत करूँ
एक बार तुम्हे मौत ने जलाया और एक बार मुझे ज़िन्दगी खा गयी